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गुरु देखूं
कहाँ मुझे फ़ुर्सत कि मैं मौसम सुहाना देखूं,
दिल तो लगा है गुरु में, क्यों ज़माना देखूं।
हर पल उन्हीं की याद में कटता है ये
सफ़र,
ख़्वाब भी वही दिखें, क्यों और फसाना देखूं।
वो जो दिखा गए राहें, मंज़िलों से आगे,
अब उनके क़दमों को ही मैं आसमाँ देखूं।
लोग कहते हैं — मौसम देखो, बहारें देखो,
मैं कहूं — गुरु की छांव है, क्यों नज़ारा देखूं।
ज़िन्दगी की किताब में बस नाम उनका
लिखा,
अब और क्या पढ़ूं, क्या में
फ़साना देखूं।
ना “चाँद” की चाह है अब, ना सितारों का नूर,
उनकी बातों में है रौशनी, कहाँ आशियाना देखूं।
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