न जाने क्यों दिल की बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।
चमकती है सूरज की किरण, हर धर्म के लिए,
पर बादलों में छुपा, सच समझा नहीं पाता
हूँ मैं।
ज़मीं तो एक ही है,
पर टुकड़े कर दिए
इंसानों ने,
इस तक्सीम को देख,
बस आंसू बहाता हूँ मैं।
न जाने क्यों दिल की
बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।
मस्जिदों
के मीनारों में, छुपी है वही रौशनी,
जो मंदिर की आरती
में, देख के मुस्कराता हूँ मैं।
जो
सीखें गुरु ग्रंथ से, या सुनें शब्द बाइबल के,
हर पन्ने में एकता
का, पैगाम
ढूंढ लाता हूँ मैं।
न जाने क्यों दिल की
बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।
मजहब के नाम पर जो, बहते खून को रोक दूँ,
ऐसी उम्मीदों से, हर रोज दुआ माँगता
हूँ मैं।
ना हिंदू ना मुसलमान, इंसान बना दू सबको,
बस अपने वजूद का, यही आईना दिखाता
हूँ मैं।
न जाने क्यों दिल की
बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।
सियासत ने जो बाँटी हैं, दीवारें दिलों में,
उन दीवारों को तोड़ने
की, राह
अपनाता हूँ मैं।
गंगा का जल पवित्र
है, तो नील
नदी भी,
हर संस्कृति की
मिठास को, दिल में बसाता हूँ
मैं।
न जाने क्यों दिल की
बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।
जिसका भी ईमान है सच्चा, वो है अपना बंदा,
बस इस सच को हर दिल में
जगाता हूँ मैं।
चाहे मेरा ईश्वर हो
या तेरा खुदा,
आसमान तो एक है,
यही समझा जाता हूँ मैं।
न जाने क्यों दिल की
बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।
ज़ुबां से बोलने की, हिम्मत नहीं कभी होती मेरी,
पर हर खामोशी में, सच्चाई गुनगुनाता
हूँ मैं।
इंसानियत का दिया
जलाने का इरादा है मेरा,
नफरतों की आंधी को बुझा नहीं पाता हूँ मैं।
न जाने क्यों दिल की
बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।
“चाँद” एक दिन
आएगा, जब यह
नफरतें मिटेंगी,
इस भरोसे में हर रात
उम्मीद जगाता हूँ मैं।
सफर तो लंबा है,
लेकिन रुकना नहीं है,
हर मोड़ पर एकता का
दीप जलाता हूँ मैं।
न जाने क्यों दिल की बातें कहे नहीं पाता हूँ मैं,
ज़माने के डर से क्यों , चुप रह जाता हूँ मैं।

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